The Tears of Devil

In the brightest days and darkest nights, He walked thy road without any fright.

 
From the dungeons of hell to the bottom of abyss, he is the ruler of all the crisis.

 
He was son of the father who gave birth to the Christ, still he chose thy path which was away from the right.

 
He didn’t choose to be outcast or stay away from the light, but his hatred for himself fueled that evil might.

 
His hunger for love grew in huge proposition, but thy ignored by all gave into evil’s disposition.

 
Once the son of god is now called the devil, all he could do is to keep up to his name and be more evil.

 
The world looked at the darker side of the dark, they hated the devil and loved all his counter parts.

 
Its not the devil never had the heart but thy people didn’t had the vision to just look beyond the dark.

 
He was stabbed in his heart when he was too young, a kid was thrown into abyss away from the morning sun.

 
In the hell he dwell as the king of the dead, he had no place for emotions or the feelings unsaid.

 
Nobody had the key to the devil’s heart, but thy hatred of the world still pierce him like a dart.

 
It takes a lot to attain the devil’s love, but a lot is at stake when one choose to love him and expect nothing at all.

 
Even a man of that demeanor can shed a tear, all it takes a true heart filled with love not fear.

 
Tears of the devil is like the gold dust, even in the evil there are signs of goodness and trust.

 
He is the king of hell and the dungeons of abyss, all he need is love in the eyes of the world to blow away thy internal crisis.

औकात

​एक पैर को जंजीर से बांधे में रखता हूं, ज्यादा उड़ न सकूँ तभी खुद को इस ज़मीन से बांधे रखता हूँ।।


तोड़ी मिट्टी ज़ेब में साथ रखता हूं, सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।


तेरा मेरा सामना अब तो कम ही होता है, पर शाम और सहर में मैं तेरा नाम याद रखता हूं।


आज बेशक़ बादशाह बन कर बैठें हैं इस तख्तोताज पर हम, लेकिन आज भी उस गुज़रे वक़्त को याद रखता हूँ।।


छोड़ कर उस मोहब्बत को हम आगे ज़रूर बढ़ गए, पर आज भी उस प्यार को इस ज़ेहन में याद रखता हूँ।।


पेट भरा है ज़रूर आज मेरा, लेकिन उस भूख को मैं आज भी साथ रखता हूँ। सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।


महफ़िलो की कमी नही आज इस जहां में, पर उन तन्हाईओं के समंदर को ज़ेहन में अब भी दबा कर रखता हूँ।।


बन्दे तेरा वज़ूद ही क्या है उस तक़दीर के आगे, माटी का मैं पुतला हूँ ये ख्वाबो में भी याद रखता हूँ।।


ख्वाहिश ज़रूर रखता हूँ मै तारों को छूने की, मगर घर है ज़मीन मेरा ये भूलने की ख़ता ना करता हूँ।।


एक पैर को जंजीर से बांधे में रखता हूं, ज्यादा उड़ न सकूँ तभी खुद को इस ज़मीन से बांधे रखता हूँ।।


सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।

फ़ौजी भाई

मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।


तुझ पर चली हर गोली और फैंके हुए पत्थर का जवाब दूँगा मै, कोई तेरा साथ दे ना दे पर साथ तेरे चलूँगा मैं।।


सही गलत का हिसाब करते होंगे ये आधुनिक साहित्यकार, मेरे लिए तो यही बहुत है कि तू लड़ता है जग से हमारे लिए बिना माने हुए कभी हार।।


भूल कर तेरी क़ुर्बानी ये दुनिया ना जाने किस ओर चली, भूल चले ये मदहोश सभी कि ये ख़ैरात की आज़ादी है कितनी लाशो के ढेरों से है हमे मिली।।



बंद कमरों में बैठ कर यूँ बाते करना तो बहुत आसान है, धूप, बारिश, सर्दी, अंधड़ इन सब से लड़ कर भी खड़े रह कर बताएं तब मैं मानु कि इन कलम के क्रांतिकारियों में भी कुछ जान है।।


मैं क्या ही दे पाउगा तुझे ऐ मेरे भाई, एक अनजान के लिए तूने है अपनी जान की बाज़ी जो लगाई।।


ना भूल तू ये कभी करना सोचने की के यहां सब तुझ से नफरत करते है, इस देश मे आज भी वो लोग ज़िंदा है जो खुद से ज्यादा इस देश से मोहब्बत करते है।।


मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।

फ़ुरसत

ढूँढा करता हु वो फ़ुरसत के पल जो बीता करते थे यारो के संग, आज कल तो जिंदगी मानो पैसे की मोहताज़ हो गई है।। बिना फ़ुरसत के तो ये दिन भी अब कोहसार सा लगता है, ना चढ़ना ही मुमकिन होता है ना कूद ही पाते है।।


हर गुज़रते लम्हे से सवाल यही पूछा करता हूँ कि तुझ से बेहतर लम्हा भी क्या कभी मैं जी भी पाऊँगा।। वो पल फ़ुरसत के जो अब भी ज़ेहन में हरे है, क्या कभी उन पलों को वापस कभी ला पाउगा।।


द्वंद छिड़ा है अंतर्मन में, विध्वंसक जिस की प्रकृति है, क्या कभी उस निर्मम क्षन को मैं भुला भी पाउगा।। क्या कभी इस जंग से निकल कर उन लम्हो को फिर जी भी पाउगा।।


जाने किस की तलाश में गुम हुँ मैं सदियों से, ना तलाश ही खत्म होती है और वक़्त भी गुज़रता जाता है।। हर उस गुज़रते पल में एक फ़ुरसत का लम्हा दम तोड़ जाता है।।

तेरा मिलना

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।

बेवज़ह ही दौड़ता रहा यहां वहां मैं यूँही निकाल दी सदियाँ बस तेरे ही इंतज़ार में।।

कागजों पर खींच लकीरें तस्वीर तेरी बनानी चाही पर क्या पता था मुझे भी की तू तो बस है मेरी ही परछाई।।

आंखों में तेरी हैं समंदर सी गहराई ना जाने हमे क्यों एक दम से दी उन में अपनी दुनिया दिखाई।।

यूँ तो पत्थर को भगवान बना कर लोग पूजते तो हैं पर तुझ में ही हमे दी इश्क़ की देवी दिखाई।।

मेरा भी वज़ूद क्या है इस विशाल जहां में, आसमां में लाखों तारे पर में कही दूर चमकता दूँगा तुझे दिखाई।।

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।

खत

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।



कई ज़िन्दगानियां दफ़न है उन अल्फाज़ो के दरमियां जिन्हें हिस्सा अतीत का हुए भी बरसो बीत गए, वो कहानियां आज भी मौज़ूद है कही उन टुकड़ो में अभी।।



उस मोहब्बत की कैद से आज़ाद हुए भी सदियां गुज़र चुकी, पर निशां बाकी है कहीं उन लकीरों में अभी।।



वो गल चुके, पीले से कागज़ के टुकड़ो को बटोरता हूँ उन दबी पुरानी किताबो में से कभी, तो सोचता हूँ कि क्या क़सूर था इन अल्फाज़ो का जो रह गए अनकहे? घोंट दिया गला जिन का इस हरज़ाई ज़माने के लिए।।

तेरे आंसूओं के निशां आज भी दिखते है उस फैली हुई स्याही पर, उन मुरझाए हुए हिस्सों में ना जाने कितनी मुस्कराहटें बंद हैं।।



दबे पांव चली आती है एक सवाल लिए वो सिरहन कभी कभी इस ज़ेहन में, कि क्यों दफना दिया तुमने मुझे उन अँधेरे कोनो में यूँही।।

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।

Complexity

In the wake of the night, nor he could sleep neither he could hide.

Clogged by the thoughts thy mind slows down and couldn’t move ahead.

Too many things to control at once, all he could do is to lose himself in the race of none.

The hunger to succeed grew up so hard, made him desperate and virtually a retard.

Mistakes of the past haunts him all night, it felt gloomy even in the bright sunlight.

He followed his heart all his life, more often then not it defied him and kept him away from the right.

Ghost of the past haunts him day and night, all he could do is smile and at times he didn’t even tried.

He was a kid who grew up big, but he never knew that all he will get a hit which would land him in the state of fit.

In the wake of night, nor he could sleep neither he could hide.