बावरा वक़्त

थक कर तेरे दामन में सिमट जाए ये वक़्त कभी तो ऐ ज़िन्दगी, कभी तो याद आए ऐसे भी की ज़रा आराम भी फ़रमान चाहिए ऐसे कभी कभी।।

एक अर्सा हुआ मानो इसे चैन से बैठे हुए, गुज़र गई कई रातें मानो इसकी बिना अपने बिस्तर में सोए हुए।।

बदलता है तो यही बदलता है, चलता है तो यही चलता है, भला कोई पूछे इससे कभी कि कितना अर्सा हुआ भाई तुझे अपना दिल खोले हुए।।

कोई तो पूछे वक़्त से भी कभी की बता वक़्त कितना हुआ तुझे यूँ घर से बेघर हुए।।

यूँ चलता जा रहा ये ले कर बोझ कई बिखरे सपनो औऱ टूटे अरमानो का, कोई तो भला पूछ लें इससे भी कभी की उत्तार दें बोझ तेरे काँधे का हम अभी।।

कभी तो हाथ थाम कर पूछे इस वक़्त से कि इस सफर में कहाँ तक पहुंचे हो तुम अभी, मंज़िल कौनसी है तेरी, है कहाँ ठिकाना तेरा।।

बेतरतीब दौड़ती इस दुनियां में कभी वक़्त मिले तुझे तो हिसाब कर लेना उन कभी जो छूट गए पीछे कहीं।।

थक कर तेरे दामन में सिमट जाए ये वक़्त कभी तो ऐ ज़िन्दगी।।

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कुछ और

यूँ तो अक्सर अल्फाज़ो में बातें बयां होती है पर खामोशी का अंदाज़ बयां कुछ और ही है।।

अपने बिस्तर पर सपने तो बहुत अच्छे आते है मगर खुले आसमाँ के तले तारे गिनने का मज़ा कुछ और ही है।।

घुट घुट कर तो जीते है सभी, पर मुस्करा कर ज़िन्दगी से लड़ने का मज़ा कुछ और ही है।।

जानी अनजानी राहों पर तो यूँही खो जाते है सब अक्सर, पर उन नयनों के समंदर में खो जाने का मज़ा कुछ और ही है।।

ढूढ़ते है हम अक्सर साथी साथ चलने को, मग़र अपनी परछाई के साथ चलने का मज़ा कुछ और ही है।।

यूँ तो भीड़ बहुत है इस दुनियां में, मिल भी जाते है लोग अक्सर यहाँ, मग़र इस भीड़ में ग़ुम कही उस तन्हाई का मज़ा कुछ और ही है।।

देर से

वो देर से ही सही पर बातों को समझ जाया करता है, वो अक़्सर ख़ामोश ही रहा करता है।।

ना ना करते करते भी वो उन सब्जियों का बोझ उठाया करता है,वो अक्सर ख़ामोश ही रह करता है।।

दिन भर की थकान भुला कर वो सारी कहानियां सुना करता है, वो शक़्स ज़ेहन में कई राज़ अक़्सर दबा कर रहा करता है।।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे वो उलझा उलझा सा रहता है, फिर भी उस मुस्कान की ख़ातिर उन उलझनों को भुलाया करता है।।

वो अक्सर देर कर देता है अहसासों को समझने में, पर कहीं अंदर वो अपने समंदरों को छिपाया करता है।।

रोटी की दौड़ में भुला कर खुद को वो यूँही बावला हुआ फ़िरता है, अपनी ज़रूरते समझने में वो अक्सर देर कर दिया करता है।।

कहानी मोह्ब्बत की शुरू तो ज़रूर हुई थी उस की भी, पर ज़िन्दगी के शोर में कहीं उस मोह्ब्बत को खो दिया करता है।।

यूँ तो अल्फाज़ो का बुन कर तानाबाना वो तराने कई लिखा करता है, पर जीवन की धुन को पकड़ने में ख़ुद को वो नाकाबिल पाया करता है।।

ज़रूरत थी उस जरूरतों को पूरा करने की, ज़रूरतों के चक्कर मे वो शक़्स ख्वाहिशों को भूल जाया करता है।।

वो देर से ही सही पर बातों को समझ जाया करता है, थोड़ा देर से ही सही पर वो खामोशियों का मतलब समझ जाया करता है।।

निगाहें

निगाहों से इश्क़ करो तो मज़ा है, अल्फाज़ो से तो बयां जहां किया करता है।।

जो मज़ा ख़ामोशी में सांसो को सुनने का है, वो कहाँ शब्दों के शोर में मिला करता है।।

इश्क़ तो वो है जो आँखों से ज़ेहन को पढ़ ले, बोल कर तो मोहब्बत का मज़ा खराब हुआ करता है।।

अक़्सर देखा है लोगो को निगाहें चुराते हुए, कहाँ निग़ाहें चुराने से आशिक़ी का मज़ा खराब हुआ करता है।।

तब्बसुम की महक तो बिखरीं रहती हवा में यूँही, कहाँ फूलों तोड़ने की ज़रूरत हुआ करती है।।

मज़बूर नहीं ये इश्क़ इतना तो हमें हैं यकीं, बस कभी कभी निगाहों से बयां करने की ज़रूरत हुआ करती है।।

यूँ तो मायूसी को लाख छिपा लो ज़ेहन में अपने, पर ये निगाहें तो बस सच ही बोला करती है।।

जहां दर्द को अल्फाज़ ना मिले वहां अक़्सर निग़ाहों से किस्से बयां होते है।।

यूँ तो चीज़ बड़ी छोटी सी है ये निग़ाहें मग़र गौरतलब किया जाए तो शमशीरे ईलाही होती हैं।।

निगाहों से इश्क़ करो तो मज़ा है, अल्फाज़ो से तो बयां जहां किया करता है।।

जो मज़ा ख़ामोशी में सांसो को सुनने का है, वो कहाँ शब्दों के शोर में मिला करता है।।

शायर की उम्र

शब्दों का बुन कर तानाबाना कविताएँ वो बनाता है,

इस दुनियां को छोड़ वो कल्पनाओं में एक जहां सजाता है।।

 

वो पूछते हैं कि कहां से लाते हो ये बातें अनसुनी सी ,

ये कहानियां अतीत की और वो किस्से भूले बिसरे से।।

 

अक़्सर ज़िक्र हुआ करता है उन खुफुसहट में इस बावरे शायर का,

मुद्दा बहस का बन जाती हैं उस की उम्र उन बासी किस्सो के आगे।।

 

उम्र से अगर तज़ुर्बे का जायज़ा होता तो इस शायर का वज़ूद ही न होता,

शब्दो की ब्यानगी में यूँ तबस्सुम ना फिर बिखरा होता।।

 

उलझन अपनी ज़िंदगी की वो सुलझाने की कोशिश करता वो यूँ अक्सर,

कागजो पर लकीरें खींच खींच कर यूँ उकेरने की कोशिश करता अपना ये सफर।।

 

वो अक़्सर पूछा करते हैं कि इन शब्दों के पीछे कौन शख्स हैं,

वो मासूम शायर भी क्या बतायें क्योंकि अक़्सर वो परछाईयों का पीछा किया करता है।।

 

घुँघराले बालों में अक्सर वो अपना चेहरा छिपाया करता है,

उस की उम्र के परे शब्दों में कई गहरे राज़ बताया करता है।।

 

अल्फाज़ो की दुनिया में एक अलग ही शहर बसाया करता है,

उन्ही अल्फाज़ो का बुन कर तानाबाना वो यूँही अपनी कवितायें बनाया करता है।।

 

इस दुनियां को छोड़ वो कल्पनाओं में एक जहां बनाया करता है।।

ख़ामोशी

मेरी ख़ामोशी का सब्ब तू ही जानता है मेरे ख़ुदा, बेशक़ तू मेरे पास नही पर ना एक पल के लिए भी तू है मुझ से जुदा।।

रेत पर खींच खींच लकीरें बनाते है हम तस्वीर तेरी, पर इस समन्दर को भी हैं कुछ बैर हम से जो उन्हें मिटा मिटा देता हमे सज़ा।।

सिमट कर आग़ोश में रात के वो चाँदनी यूँ कहीं खो गई, मानो सुखी ज़मीन पर पड़ी इकलौती बरखा की बूंद मिट्टी में कही सो गई।।

तलाश छांव की थी इस दहकती धूप में, इस तपते सूरज की चमक झेलते झेलते खुद के चेहरे की चमक कहीं खो गई।।

शब्दों की बेड़ियों में उलझ कर ज़िन्दगी मानो यूँही फस गई, भूल कर जीना वो भी बढ़ती उम्र के साथ अपनी मासूमियत खो गई।।

यूँ तो ख़ामोश निगाहें कर देती हैं कहानियां बयां, पर इन अल्फाज़ो के बीच कहीं अनजाने में कहानियां कई।।

मेरी एक ख़ामोशी का सब्ब बस एक तू ही तो जानता है ऐ मेरे खुदा।।

मासूम मोह्ब्बत

वो मासूम मोह्ब्बत जो आंखों में रहा करती है,

चुप सी रहती है पर बातें बहुत कहना चाहती है।।

 

थाम कर एक दूजें का हाथ वो चलने को कहती है,

कुछ दूर ही रहती है क्योंकि पास आने से वो थोड़ा डरती है।।

 

सपनों में जहां बसा कर अपना उन सपनों में वो खोई रहती है,

जीवन की भारी दोपहरी में भी वो सोयी सी रहती है।।

 

रेत के घरोंदे बना कर उस समंदर से यही वो कहती है,

लहरों को दूर रखना अपनी, इन नाज़ुक घरोंदों में उम्मीद मेरी कहीं रहती है।।

 

ख़ामोशी की जुबां पर उसने माहरत भी हासिल कर ली है,

शब्दों के परे अहसासों की दौलत भी हासिल कर ली है।।

 

उस पत्थर से दिल लगा कर उस पत्थर में भी दिल डाल दिया,

दिल की गहराइयों में क़ैद उस बच्चे को जीवन की बेड़ियों से फ़िर छुड़ा दिया।।

 

सुबह की आस लगा कर रातों को बेफ़िक्र सपनों में डूबीं रहती है,

ठंडी हवा के झोंके जैसे पर्वतों के आग़ोश में लिपटे रहते है।।

 

कागज़ की कश्ती को उसने जीवन के भवसागर में उतार दिया,

मुस्कराहट से उन लहरों में उठते तूफ़ान को दबा दिया।।

 

जग जीत कर बैठा था वो शिखर पर फ़िर भी अंदर से खाली था,

हारकर अपने दिल को उसने भीतर का ख़ालीपन भी दूर किया।।

 

वो मासूम मोह्ब्बत जो आंखों में रहा करती है,

चुप सी रहती है पर बातें बहुत कहना चाहती है।।