गुजरता वक़्त

वक़्त यूँ गुजरता रहा मानो रेत बंद मुठी में से, खड़े रहे राहो में हम खड़ा हो मील का पत्थर जैसे|
इंतज़ार में गुज़र गई सदियाँ यूँ ही पर तेरा आना  न मुमकिन हुआ एक पल भी कैसे|
दुनिया चलती रही आगे बढ़ती रही,ना जाने क्यों हम थम गए एक पल में कैसे|
सपनो को दफ़न करते करते ना जाने ख्वाहिशो का जनाज़ा निकल दिया कैसे|
न जाने कब वक़्त से पीछे रह गए, सारा वक़्त यूं ही ज़ाया कर दिया हमने कैसे|

आरज़ू थी की एक मुकमल जहाँ मिले, थोड़ी ज़मीं तोडा आसमां मिले, ये हिज़्र का हाथ ही मानो खंज़र हो गया न ज़मीं मिली न आसमां मिला और अपना सुकूँ खो गया ऐसे|
वक़्त भी मानो यूँ गुज़रता गया किसी बेवफा सनम के जैसे,जिसे ठहरने का वक़्त भी न था और साथ देने की तमना भी ना थी|
सारा वक़्त यूँ ही ज़ाया कर दिया हमने ऐसे||

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