किस्सा यादों का

कभी  यादो  का  किस्सा  खोलता  हु  तो  बिखरी  दिखती  है  यादें  कई ,
भूली  बिसरि  सी  बाते  कई , वो  आँखों  में  गुजारी  रातें  कई||
वक़्त  के थपेड़ो  में  कही  इन  यादो  पर  जम  गई  है  धुल  कही,
कभी  इस  धुल  को  हटाता  हूँ  तो  कानो  में  गूंजती  है  वो  बाते  जो  थी  कही|
यूं  कभी  यादो  का  किस्सा  खोलता  हूँ  तो  बिखरी  दिखती  है  वो  यादें  कई||

जाने  कितने  पन्ने   फाड़  फाड़  फेंके  हमने  उस  यादो  की  किताब  से,
आज  उन  बिखरे  पन्नो  को  समेटता  हूँ  तो  ज़हन  में  आ  जाती  है  ना  जाने  फिर  से  वो  यादें  सभी ||
याद  आती  है  वो  यादें  कई  जिनने  दफना  के  कभी  चैन  से  सोया  करते  थी  कभी ||
कभी  यादो  का  किस्सा  खोलता  हु  तो  बिखरी  दिखती  है  यादें  कई||
कभी  थक  कर  बैठ  जाया  करते  थी  जिस  दऱख्क्त की  छाव  में , आज  भी  उस  दऱख्क्त  को  दूंदते  है  हम  अक्सर  इस  ज़माने  की  धुप  में ||

यूं  गुजारी  बातो  का  हिसाब  करते  है  तो  अक्सर  आज  की  बाते  बेमानी  सी  यूं  लगाती  है  सभी |कभी  यादो  का  किस्सा  खोलता  हु  तो  बिखरी  दिखती  है  यादें  कई||
तारो  की  छाव में  गुज़ारा  करती  थी  वो  राते  कभी , बुना  करते  थे  कहानिया  जो  हमेशा  रही  उनकाही| जिस  सैलाब  को  न  हमने  कभी  थमने  दिया  लगता  है  आज  वो  बंध गया  है  कही||

कभी  यादो  का  किस्सा  खोलता  हु  तो  बिखरी  दिखती  है  यादें  कई||

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