ये आवारगी

ये आवारगी ना  अपने किसी काम आई , वक़्त ही गवाया हमने और हाथ में बस ख़ाक ही पाई|
यूँ तो सफर मीलों का किया पर मंज़िल कोसो दूर ही नज़र आई| ये आवारगी ना अपने किसी काम आई ||

तज़ुर्बा बहुत किया हमने पर उस की कीमत अपने वक़्त से ही चुकाई|
अल्फाज़ो में पिरो कर बहुत बार एक कहानी हमने बनाई, पर अक्सर वो कहानी उन बिखरे पन्नो में अधूरी ही पाई| ये आवारगी ना अपने किसी काम आई||

ज़ंज़ीरो में बंधे जानवर से ज्यादा बेबसी खुले आसमान के परिंदो में पाई|
पत्थर की दीवारों से ज्यादा दिखी लोगो के ज़ेहन के भीतर तन्हाई|| ये आवारगी ना अपने किसी काम आई||

लाखो की भीड़ में भी हर आँख में दिखी एक अलग सी तन्हाई, सपनो का कतल कर के ना जाने दुनिया ने कोनसी मंज़िल है पाई || ये आवारगी ना अपने किसी काम आई||

रोज मासूमियत का सौदा करते यूँ ज़िम्मेदारी हमें नज़र आई , भूखे तन को हड्डियों तक नोचती ज़रूरतों की असलियत भी सामने पाई | ये आवारगी ना अपने किसी भी काम आई||

सिक्कों पर नाचती दुनिया की असलियत भी यूँ सामने आई, आदर्शो को बेंच कर लोगो ने खूब यहाँ वह वाही पाई | ये आवारगी ना अपने किसी भी काम आई ||

गुज़र बसर करने को रोज लड़ती हमने अक्सर ज़िन्दगी पाई, थक हार कर बैठी हमने देखी अँधेरे में सच्चाई की वो परछाई| ये आवारगी ना अपने किसी भी काम आई||

बचपन के खेलो में जवानी की छाप हमें रोज दी यूँ दिखाई, उम्र से आगे बढ़ कर क्या पाया दुनिया ने ये बात हमने ना ज़रा भी समझ आई| ये आवारगी ना अपने किसी काम आई||

प्रेम को हमने महफ़िलो में यूँ बिकते देखा,चंद नोटों की बूख में खूबसूरती मिटटी में मिली रोज़ नज़र आई| जीवन की आपाधापी में तड़पती ज़िन्दगी नज़र आई| ये आवारगी बा अपने किसी भी काम आई||

मंज़िल की तलाश में पथिक यु तड़पते दिए दिखाई,मानो जीवन और मृत्यु की वही हो आखरी लड़ाई|
क्षणिक लाभ के हेतु एक दूसरे का गला घोंटते सारी दुनिया दी दिखाई| ये आवारगी ना अपने किसी भी काम आई||

कल्पना के परे संसार की असलियत यूँ नज़र आई, मानो पर्दो के पीछे की वास्तविक प्रतिमा समकक्श हो चली आई| आखिर ये आवारगी कुछ तो हमारे काम आई,अन्यथा वक़्त ही गवाया था हमने और हाथ में बस ख़ाक ही थी पाई||

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