मुझे जान के भी

मुझे जान के भी क्यों तू मुझ से जुदा जुदा सा है, मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।

तेरा मेरा ये रिश्ता है बंद मुट्ठी में रेत के जैसा, एक पल तू अपना है दूसरे पल बेगाने जैसा सा है,

यूँ आसमां छूने के ख्वाब ना देखे थे कभी, तेरा ना होना फिर क्यों लगे है गर्त में जाने जैसा सा है।

मुझे जान के भी क्यों तू मुझ से जुदा जुदा सा है, मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

वो तेरी खुली आँखों के ख्वाब आज भी याद है हमें, उन ख्वाबो में बना आशना तो मेरे घर सा है,

समंदर को उफनते तो हमने अक्सर देखा है, पर ये सन्नाटा देख के आज फिर दिल बड़ा बेचैन सा है।

मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

उस के आने की उम्मीद लगाए तूने रातें कई गुजारी, उस का इंतज़ार भी तू ही जाने कितना बेरहम सा है,

वो मिट्टी घरोंदों का लहरो से टकरा के भीकर जाना, तू ही जाने है कि वो दर्द किसी मौत के जैसा सा है।

मुझे जान के भी क्यों तू मुझ से जुदा जुदा सा है, मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

वो स्याह आँखों की तन्हाई से जो तू रोज़ लड़ती है,  तेरी हर रात अकेली तो दिन जंग सा है,

बंज़र धरती पर एक बूँद की उम्मीद लिए तू जीती है, तेरा वो सब्र भी तारीफ़ के काबिल सा है।

मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

आँखों की नमी से जो फैला तेरा वो काजल, मानो साफ़ आसमां पर किसी गहरे निशां सा है,

बंद पलकों के पीछे जो सपने तू देखती है, तेरा हेर सपना खुद में ही एक किस्सा सा है।

मुझे जान के भी क्यों तू मुझ से जुदा जुदा सा है, मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

तेरे अधरों कि मुस्कान जाने क्या कहती है, वो ज़ेहन की बात भी मानो किसी तिलस्मी राज़ सी है,

तेरी कहानी भी यूँ अनकही ही रहती है, मानो रात के अंधियारे में चाँदनी का सिमटना हो जैसे।

मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

 

तेरा मेरा रिश्ता भी चातक और बरखा के जैसा सा है, मेरी हर प्यास का सब्ब तू है और ना कोई ज़वाब तेरे जैसा है,

चेहरा जब भी तेरा देखु तो लगे आईना देखने जैसा सा है, गैर हो कर भी तू लगे जैसे कोई अपना सा है।

मुझे जान के भी क्यों तू मुझ से जुदा जुदा सा है, मैं हूँ तेरा ये फिर भी जान के क्यों तू इतना बेरुखा सा है।।

Animal Vs Animal

They have walked this earth even before our ancestors were born. We are all successors of one of them, even our gene has originated from them. We used to live in harmony for years and it did made the earth sustain the balance in the ecosystem. But gradually our brain started to increase in size and we started to develop the sense of thinking and intelligence.

For once they had the strength to over power us but with our intelligence we developed ways to tame them and hunt as well. The space which we both shared once was taken up by us. The one who was animal once turned into human. They spread as algae on this earth while slowly consuming the resources. Our supremacy over everything increased gradually while our arrogance and self centeredness increased with the greater speed. For years this world saw harmony and love among all living beings with a few random clashes but since the evolution of modern human it has seen many wars. We seem to be too fascinated by power which has been more often than not the driving force to cause huge destruction. We have turned human from outside and more animalistic inside. Too many resources stocked up with too few people has made the world worst as a lot of living beings are fighting for too few resources that are available to them. We have encroached the space of animals and now they are finding it too hard to sustain, many species have lost to this evolution and many are on the verge of losing the fight. We being the most capable species should have nurtured the rest instead we are slowly eliminating them.

It’s the animal of the inside which is consuming us, which is killing the human and nurturing the devil inside. It’s on us what we choose to become , to stay human or be worst than an animal. It’s a fight which is not supposed to be fought outside it’s actually a duel between the animal and the human inside. Stay your ground with firm belief and never give in to those powers which try to stray you from your course. Always stay connected to reality that you are born to be human not animal , you are born to fight for the weak. It’s not the animal that is outside is your enemy it’s the animal with in that you need to tame.

वक़्त की गुत्थी

वक़्त की गुत्थियां सुलझा रहा हैं या मानो खुद ही उलझता जा रहा हैं,

किनारे की तलाश में गहरे समंदर में उतरता जा रहा हैं।

डूबने का तो डर नहीं पर फिर भी ना जाने आगे बढ़ने से क्यों कतरा रहा हैं

इस बंज़र धरा पर कही छांव मिलने की आस लगा रहा हैं,

वास्तविकता के परे शायद अब उम्मीद का आँचल थामे जा रहा हैं।

बेमतलब है इस सूखे आसमां से बरखा की उम्मीद लगाना,

ये तो फितरत है इंसां की जो हर मोड़ पर ढूंढे है सहारा,

वरना दम तो उस में है जो अकेला ही हर जंग लड़ता जा रहा है।

शब्दो के सहारे कब किसे मंज़िले मिलती हैं,

फिर भी सपनो की दुनिया में आज वो अपना गुज़रा कल जीता जा रहा है।

ब्रह्मांड की खोज में निकला वो घर अपना छोड़ कर,

पर शुन्य में गुम हो कर रह गया अपना असली वज़ूद वो भूल कर।

विषमताओं से लड़ते लड़ते अब वो थकता जा रहा है,

यूँही उस की आँखों से दूर उस का मंज़र होता जा रहा है।

खुद से ही उलझना ही रहा मुकदर उस का,

वही कश्ती भी था और उसी में रहा किया समंदर उस का।

किस से पूछे वो कि कहाँ बरसो से गुम है,

हर जगह ढूंढता फिर रहा उसे घर उस का।

सुनहरा ख्वाब देखे मुद्दते उसे हो गईं हैं,

जागता रहता है हर नींद में भी बिस्तर उस का।

वक़्त की गुत्थियां सुलझा रहा हैं या मानो खुद ही उलझता जा रहा हैं।।

The Art of Minimalism

In this world of riches every body seems to be making a run for accumulating things. Things to quench their unending thirst for pleasures of life. Though they end up owning more than they often require. we are never satisfied with what we have, some wants a bigger house, some latest mobile and some seek for better relationships. This trend has resulted in accumulation of too many resources with a few people, leaving  rest of the world fight for too few. This clearly creates an imbalance in the society leading towards agitation among people.

We must give it a thought while we make up our mind for buying a new thing. We must ask ourselves that do we really need it? This simple question might change your decision and stop you from going ahead. Even god gave us nothing when we were born except our parents and we are not going to take anything with us when we make our journey way back to him. Then why run the race which will never count because its bare minimum things that we require to live a happy life.

We must practice the art of minimalism which will make us live more with limited amount of resources. Carrying less baggage will make you live more. It the wrong path we have been walking on it actually leads nowhere except leaving us in despair. The quality of life improves once we settle for less and enjoy the space and time we save. An empty hand is far better than a closed fist because you can hold more hands when you are empty-handed. Perhaps this is the high time that we make a shift in our lives and utilize our time connecting to ourselves rather than wasting it in accumulating materialistic wastes. This hunger will lead us nowhere it’s better to make amends in our approach and start enjoying life more with people rather then wasting them on dead things.

सावन 

सावन की काली रातों में जब दिल का दरवाजा खुलता है,

बिछड़ा पुराना सा वो साया होले होले भीतर घुसता है,

अँधेरी कोठारी में जब फिर मोहब्बत का दिया जल उठता है,

सूने आँगन में तब चहल पहल का मौसम लौट आता है,

वो बंद कमरा फिर मिट्टी की खुशबू से भर उठता है।

सावन की काली रातो में जब दिल का दरवाजा खुलता है।।

 

धुल भरे उस कमरे में जब कोई नंगे पाँव चलता है,

उन सीलन भरी दीवारों पे मानो वापस से रंग ढुलता है।

ठन्डे पड़े उस चुहलें को जब वापस से आग की तपिश मिलती है,

सदियों से भूखे उस घर में तब प्यार की रोटी सिकत्ति है।

सावन की काली रातों में जब दिल का दरवाजा खुलता है।।

 

उन मृगनयनी की आँखों में जब वापस से सपने दिखते है,

उस बेचैन ज़ेहन की लहरों को सुकून तब मिलता है।

तेरे कदमो की आहट से उठ जाता है वो पल भर में,

जो ख्वाब दफ़न था उस ज़ेहन में कई सदिओं से।

सावन की काली रातो में जब दिल का दरवाजा खुलता है।।

 

छिप के बैठा था जो इंसान उस शैतान के साए में बरसो से,

पल भर में निकल आया उस रोशनी में जो फैली थी तेरी मुस्कराहट से।

वो जानवर बन छिपा रहा इस दुनिया से सालो तक,

पिंघल गया वो पल भर में सिमट के उस के आँचल में।

सावन की काली रातो में जब दिल का दरवाजा खुलता है,

मानो उस बेरंग से जीवन में फिर से कोई रंग घुलता है।

सावन की काली रातो में।।

A Walk Along The Memory Lane

We seldom take a walk along the memory lane, but when ever we do, we realize it was not in vain.

The slumber of night drags our feet but there is something inside which takes the heat.

There is this road which doesn’t seems to end, still we hope of a distant fairy land.

Too many clauses restricts the flow, are you ready to break free and take the blow.

Millions of dreams laying dead across the path do we have it in us to pick one and put it in our heart.

A sense of realization digs deeper in the heart or its the lack of direction which tears us apart.

Beauty of those eyes is hard to forget, it leaves you mesmerized and you can’t avoid the effect.

The love which you seek reside in those dreams, time loses its track as it’s a place where reality never intervenes.

It gets heavy when you are too much engrossed, too much involvement makes you get lost.

Walk across the memory lane is not as pleasant as it seems, it can give you pain which you can’t imagine even in your dreams.

Path is not often rosy either gloomy for ever, it’s the mix of the traumas and smiles all together.

Deeper you go harder it is to return, it’s on you whether you chose to stay or head back home.
Fill your heart with the sweetness of that love which you left in the journey just to be with the herd.
It’s a long road back home, do you have it in you to walk all alone?

we seldom take a walk along the memory lane, but when ever we do we realize it was not in vain!!!

पहेली

एक अनजान पहेली है तू जिसे समझ ना पाया हूँ मैं कभी,

भीड़ में भी अकेली है तू तुझे खोज ना पाया हूँ मैं अभी।

पल पल जिया तेरे साथ हूँ मैं, मेरे हर तनहा पल की सहेली है तू,

एक अनजान पहेली है तू जिसे समझ ना पाया हूँ मैं कभी।।

 

कागज़ पे खिंच लकीरे मैंने तस्वीर तेरी बनानी चाहि,

पर उन तस्वीरो में ना जाने क्यों हमने एक बेबसी ही पाई।

हर आहट को महसूस कर ना जाने क्या धुन है तूने बनाई,

उस धुन की हर गुन गुन में एक विकट सी है तन्हाई।

अनजान पहेली है तू जो हमें ज़रा भी समझ ना आई।।

 

क्या बाँध सकूँगा इन लफज़ो में तेरे अहसास के दामन को मैं,

क्या बाँध सकूँगा उन लम्हो को जिन्होंने देखी है पल पल रुसवाई।

ये कटु सत्य है कि अहसासों की अर्थी जलती हमने देखी है,

देखा है अग्नि में राख हुए अश्क़ो को हमने भी देखा है,

अहसासों की अर्थी पर हमने इस दुनिया को हँसते भी देखा है।

 

इस जीवन की आपा धापी में क्या पाया क्या खोया तूने,

पाने का हिसाब नहीं पर खोने पर तुझ को भी रोते देखा है हमने।

वक़्त के तुफानो से भी लड़ते हुए तुझे देखा हमने,

उन उजाड़े मकानों के मलबे में ज़िन्दगी ढूंढते देखा हमने।

अनजान पहेली है तू मगर तुझे भी उलझते देखा हमने।।

 

पत्थर को भगवान् बना कर उस को पूजते हम क्यों है,

इंसानो की कद्र नही पर उस पत्थर से प्रेम करते देखा है हमने।

पलकों के पीछे टूटे सपनो पर तुझे भी सिसकियां भरते सुना है हमने,

चाँद की तलाश में टूटे तारे गिनते तुझे भी देखा हमने।।

 

डर के दुनिया से तूने खुद को इतना जो दबाया है,

उस डर को तेरी दबी हँसी के पीछे महसूस किया है हमने।

उन तरसती आँखों में बिखरे ख्वाबो की नमी को जीया है हमने,

छिपे हुए तेरे हर दर्द को भी महसूस किया है हमने।।

 

हां सुनी है उन बोझिल धड़कनो से मैंने तेरी हर वो कहानी,

जिन के अंत में ना कभी मिली थी राजा को उस की रानी।

एक अनजान पहेली है तू, इस भीड़ में कितनी अकेली है तू,

तुझे न समझ पाया हूँ में कभी ना समझ पाया हूँ में कभी।।