इश्क़

​ये इश्क़ भी क्या चीज़ है जो बदल देती है इंसान को,

किसी को तो बेहतर इसने किया कही किसी का मंज़र ही बदल दिया।।


दस्तूर है इस दुनिया का कि इसने कभी इश्क़ को ना क़ुबूल किया, ग़ालिब भी कहते कहते यूँ मर गया कि निकम्मा उसे इस इश्क़ ने ही था किया।।


उस दिल के समंदर को ख्वाबो से जिसने था भर दिया, वो इश्क़ ही था जिसने उस सूने से घर को था चहका दिया।


ये फितरत है तेरी जो अपनो को तूने यूँही ठुकरा दिया, ये तो इश्क़ ही था जिसने अपनो को बिछड़ने से बचा लिया।।


ये इलाइची सी ज़िन्दगी है जो पिसती जीतनी उतनी ही महकती है, जो फ़साना तेरा मेरा है उस का सन्नाटा ही इश्क़ सा है।।


गुज़रती उम्र के साथ तज़ुर्बा यूँही बढ़ता रहा, मैं बदलता रहा ये ज़माना भी बदलता रहा, उस इश्क़ में थी कुछ बात  जो अफसाना यूँही बनता रहा।।


अल्फाज़ो में बाँध कर वो कहानी एक बनाती रही, ज़िन्दगी भी आग सी खुद ही धुक धुक जलती रही। 

भूल कर बैठा था जिस की याद में संसार को, वो उम्मीद भी आज तेरा दरवाज़ा खटखटाती रही।।


एक परछाई उस अन्धकार में हर पल जो तेरे साथ थी, वो इश्क़ ही था जिससे तूने सदियों से ना कही कोई बात थी।।


ये इश्क़ भी क्या चीज़ है यारो जो बदल देती है इंसान को।।

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