खत

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।



कई ज़िन्दगानियां दफ़न है उन अल्फाज़ो के दरमियां जिन्हें हिस्सा अतीत का हुए भी बरसो बीत गए, वो कहानियां आज भी मौज़ूद है कही उन टुकड़ो में अभी।।



उस मोहब्बत की कैद से आज़ाद हुए भी सदियां गुज़र चुकी, पर निशां बाकी है कहीं उन लकीरों में अभी।।



वो गल चुके, पीले से कागज़ के टुकड़ो को बटोरता हूँ उन दबी पुरानी किताबो में से कभी, तो सोचता हूँ कि क्या क़सूर था इन अल्फाज़ो का जो रह गए अनकहे? घोंट दिया गला जिन का इस हरज़ाई ज़माने के लिए।।

तेरे आंसूओं के निशां आज भी दिखते है उस फैली हुई स्याही पर, उन मुरझाए हुए हिस्सों में ना जाने कितनी मुस्कराहटें बंद हैं।।



दबे पांव चली आती है एक सवाल लिए वो सिरहन कभी कभी इस ज़ेहन में, कि क्यों दफना दिया तुमने मुझे उन अँधेरे कोनो में यूँही।।

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।

Complexity

In the wake of the night, nor he could sleep neither he could hide.

Clogged by the thoughts thy mind slows down and couldn’t move ahead.

Too many things to control at once, all he could do is to lose himself in the race of none.

The hunger to succeed grew up so hard, made him desperate and virtually a retard.

Mistakes of the past haunts him all night, it felt gloomy even in the bright sunlight.

He followed his heart all his life, more often then not it defied him and kept him away from the right.

Ghost of the past haunts him day and night, all he could do is smile and at times he didn’t even tried.

He was a kid who grew up big, but he never knew that all he will get a hit which would land him in the state of fit.

In the wake of night, nor he could sleep neither he could hide.

अतीत

मेरे वज़ूद की तलाश में यूँही अतीत की परतें हटाता चला गया, मिला तो कुछ भी नहीं बस यूँही खुद को गवाता चला गया।।


महफ़िलो में रंग भरते भरते मैं अपने रंग यूँही उडाता चला गया, चाहते अपनी जला कर ख्वाब दुसरो के सजाता चला गया।।


उन धुल भरी किताबो में कई चेहरे मिले जाने पहचाने से, उन भूली बिसरी यादों को मैं सीने से लगता चला गया।।


पंछी जो छोड़ गए थे आशियाने को उनकी तलाश में वक़्त यूँही गवाता चला गया, वो बंज़र ज़मीन पर एक बूँद की आस में अपनी प्यास बेमतलब ही बढ़ाता चला गया।।


खुली आँखों से देखे थे जो सपने हमने कभी, उन की ख़ाक को मुट्टी में भरता चला गया, उस भूली मोह्ब्बत की याद में दिन को रात और रात को दिन करता चला गया।।



ना जाने किस परछाई का पीछा करते करते उस मंज़िल से दूर मैं होता चला गया, जो राहे मुडती थी मेरे घर की ओर उन्हें छोड़ बेवज़ह ही दुनिया में भटकता मैं चला गया।।


सन्नाटे की खोज में उस चकाचोंध से दूर होता चला गया, आज को भूल कर फिर उस अतीत में खोता चला गया।।


मेरे वज़ूद की तलाश में यूँही अतीत की परतें हटाता चला गया, मिला तो कुछ भी नहीं बस यूँही खुद को गवाता चला गया।।