फ़ौजी भाई

मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।


तुझ पर चली हर गोली और फैंके हुए पत्थर का जवाब दूँगा मै, कोई तेरा साथ दे ना दे पर साथ तेरे चलूँगा मैं।।


सही गलत का हिसाब करते होंगे ये आधुनिक साहित्यकार, मेरे लिए तो यही बहुत है कि तू लड़ता है जग से हमारे लिए बिना माने हुए कभी हार।।


भूल कर तेरी क़ुर्बानी ये दुनिया ना जाने किस ओर चली, भूल चले ये मदहोश सभी कि ये ख़ैरात की आज़ादी है कितनी लाशो के ढेरों से है हमे मिली।।



बंद कमरों में बैठ कर यूँ बाते करना तो बहुत आसान है, धूप, बारिश, सर्दी, अंधड़ इन सब से लड़ कर भी खड़े रह कर बताएं तब मैं मानु कि इन कलम के क्रांतिकारियों में भी कुछ जान है।।


मैं क्या ही दे पाउगा तुझे ऐ मेरे भाई, एक अनजान के लिए तूने है अपनी जान की बाज़ी जो लगाई।।


ना भूल तू ये कभी करना सोचने की के यहां सब तुझ से नफरत करते है, इस देश मे आज भी वो लोग ज़िंदा है जो खुद से ज्यादा इस देश से मोहब्बत करते है।।


मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।

फ़ुरसत

ढूँढा करता हु वो फ़ुरसत के पल जो बीता करते थे यारो के संग, आज कल तो जिंदगी मानो पैसे की मोहताज़ हो गई है।। बिना फ़ुरसत के तो ये दिन भी अब कोहसार सा लगता है, ना चढ़ना ही मुमकिन होता है ना कूद ही पाते है।।


हर गुज़रते लम्हे से सवाल यही पूछा करता हूँ कि तुझ से बेहतर लम्हा भी क्या कभी मैं जी भी पाऊँगा।। वो पल फ़ुरसत के जो अब भी ज़ेहन में हरे है, क्या कभी उन पलों को वापस कभी ला पाउगा।।


द्वंद छिड़ा है अंतर्मन में, विध्वंसक जिस की प्रकृति है, क्या कभी उस निर्मम क्षन को मैं भुला भी पाउगा।। क्या कभी इस जंग से निकल कर उन लम्हो को फिर जी भी पाउगा।।


जाने किस की तलाश में गुम हुँ मैं सदियों से, ना तलाश ही खत्म होती है और वक़्त भी गुज़रता जाता है।। हर उस गुज़रते पल में एक फ़ुरसत का लम्हा दम तोड़ जाता है।।

 

ढूँढा करता हु वो फ़ुरसत के पल जो बीता करते थे यारो के संग।।

तेरा मिलना

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।

बेवज़ह ही दौड़ता रहा यहां वहां मैं यूँही निकाल दी सदियाँ बस तेरे ही इंतज़ार में।।

कागजों पर खींच लकीरें तस्वीर तेरी बनानी चाही पर क्या पता था मुझे भी की तू तो बस है मेरी ही परछाई।।

आंखों में तेरी हैं समंदर सी गहराई ना जाने हमे क्यों एक दम से दी उन में अपनी दुनिया दिखाई।।

यूँ तो पत्थर को भगवान बना कर लोग पूजते तो हैं पर तुझ में ही हमे दी इश्क़ की देवी दिखाई।।

मेरा भी वज़ूद क्या है इस विशाल जहां में, आसमां में लाखों तारे पर में कही दूर चमकता दूँगा तुझे दिखाई।।

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।