ख़ामोशी

मेरी ख़ामोशी का सब्ब तू ही जानता है मेरे ख़ुदा, बेशक़ तू मेरे पास नही पर ना एक पल के लिए भी तू है मुझ से जुदा।।

रेत पर खींच खींच लकीरें बनाते है हम तस्वीर तेरी, पर इस समन्दर को भी हैं कुछ बैर हम से जो उन्हें मिटा मिटा देता हमे सज़ा।।

सिमट कर आग़ोश में रात के वो चाँदनी यूँ कहीं खो गई, मानो सुखी ज़मीन पर पड़ी इकलौती बरखा की बूंद मिट्टी में कही सो गई।।

तलाश छांव की थी इस दहकती धूप में, इस तपते सूरज की चमक झेलते झेलते खुद के चेहरे की चमक कहीं खो गई।।

शब्दों की बेड़ियों में उलझ कर ज़िन्दगी मानो यूँही फस गई, भूल कर जीना वो भी बढ़ती उम्र के साथ अपनी मासूमियत खो गई।।

यूँ तो ख़ामोश निगाहें कर देती हैं कहानियां बयां, पर इन अल्फाज़ो के बीच कहीं अनजाने में कहानियां कई।।

मेरी एक ख़ामोशी का सब्ब बस एक तू ही तो जानता है ऐ मेरे खुदा।।

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मासूम मोह्ब्बत

वो मासूम मोह्ब्बत जो आंखों में रहा करती है,

चुप सी रहती है पर बातें बहुत कहना चाहती है।।

 

थाम कर एक दूजें का हाथ वो चलने को कहती है,

कुछ दूर ही रहती है क्योंकि पास आने से वो थोड़ा डरती है।।

 

सपनों में जहां बसा कर अपना उन सपनों में वो खोई रहती है,

जीवन की भारी दोपहरी में भी वो सोयी सी रहती है।।

 

रेत के घरोंदे बना कर उस समंदर से यही वो कहती है,

लहरों को दूर रखना अपनी, इन नाज़ुक घरोंदों में उम्मीद मेरी कहीं रहती है।।

 

ख़ामोशी की जुबां पर उसने माहरत भी हासिल कर ली है,

शब्दों के परे अहसासों की दौलत भी हासिल कर ली है।।

 

उस पत्थर से दिल लगा कर उस पत्थर में भी दिल डाल दिया,

दिल की गहराइयों में क़ैद उस बच्चे को जीवन की बेड़ियों से फ़िर छुड़ा दिया।।

 

सुबह की आस लगा कर रातों को बेफ़िक्र सपनों में डूबीं रहती है,

ठंडी हवा के झोंके जैसे पर्वतों के आग़ोश में लिपटे रहते है।।

 

कागज़ की कश्ती को उसने जीवन के भवसागर में उतार दिया,

मुस्कराहट से उन लहरों में उठते तूफ़ान को दबा दिया।।

 

जग जीत कर बैठा था वो शिखर पर फ़िर भी अंदर से खाली था,

हारकर अपने दिल को उसने भीतर का ख़ालीपन भी दूर किया।।

 

वो मासूम मोह्ब्बत जो आंखों में रहा करती है,

चुप सी रहती है पर बातें बहुत कहना चाहती है।।

ख़र्च होती ज़िन्दगी

गुज़रते वक़्त के साथ यूँ खर्च होती ज़िन्दगी, मानो लगी हो आग तेल के कुऐं में कहीं,

फ़र्क तो बस इतना है कि यहाँ धुआं दिखाई नही देता।।

वो बहुत सिसकती हैं और बिलख बिलख कर ख़ूब रोती है,

फर्क़ तो बस इतना है कि उस की आवाज़ किसी को सुनाई नही देती।।

मुस्कराहटें अक्सर चेहरें को छिपा दिया करती है,

मग़र उन मुस्कराहटों के पीछे का दर्द किसी को दिखाई नहीं देता।।

लाखों राज़ यूँही दफ़न रहते है उस ज़ेहन के भीतर,

उस सीने पर पड़ा बोझ क़भी किसी को दिखाई नही देता।।

महलों में रहनेवाले बदस्तूर चकाचोंध से अंधे हुए रहते हैं,

दिलों में दूरियाँ हैं इतनी कि एक दुजें की आवाज़ भी वहां सुनाई नही देती।।

यूँही वक़्त के साथ ख़र्च कर देते हैं हम ज़िन्दगी,

फर्क़ तो बस इतना हैं कि हमारी कुछ कमाई नही होती।।

नारी

तेरे होने पर अहसास होता है जीवन का,

तू न होती तो इस धरा पर जीवन का होना ना मुमकिन होता।।

तेरी गोद मे पल कर बड़े हुए, तेरी उंगली थाम कर चलना सीखा सबने,

तू ना होती तो यूँ बेफ़िक्र जीना ना मुमकिन होता।।

इस कलाई को सजाया तूने, झूठ बोल कर ना जाने कितनी बार बचाया तूने,

तू ना होती तो यूँ खुद से लड़पाना ना मुमकिन होता।।

बचपन में साथ निभाया तूने, दोस्त बन कर खूब हंसाया तूने,

तू ना होती तो यूँ ख़ुशी से जी पाना ना मुमकिन होता।।

तू माँ है, तू ही है भगिनी, तू दोस्त है, तू ही प्रेमिका है, तू है जगत जननी और अंतकाल तू ही है विध्वंसिनी।।

तेरे होने पर ही अहसास होता है जीवन का,

तू ना होती तो इस धरा पर जीवन का होना ना मुमकिन होता।।

इंतज़ार

इस शाम को इंतज़ार तेरा आज भी है, उन गलियों को तुझ से प्यार आज भी है,

मानता है जिन्हें तू बेगाना उन बेगानों को तुझ से प्यार आज भी है।।

 

वक़्त की गुत्थियां सुलझाने में माना तू बहुत है उलझ गया,

पर उस ख़ाली घर को तेरे आने की आस आज भी है।।

 

चंद कागज़ो की दौड़ में तू भूल बैठा जिस ममता के आँचल को,

तेरी उस बूढ़ी माँ को तेरे घर आने की आस आज भी है।।

 

ना जाने किस मृगतृष्णा से तू यूँ व्यथित हो रहा,

ख़ुद को तो तूने खो दिया अब संबंधों को भी बेवज़ह खो रहा।।

 

ये चेहरे की झुर्रियाँ और वो बढ़ती उम्र आईना नहीं तेरे तज़ुर्बे का,

उन पथराई आंखों में किसी मंज़िल का इंतज़ार आज भी है।।

 

उस अनजाने जहां की तलाश में बहुत दूर ले आया है तू कश्ती अपनी,

क्यों भूल बैठा है तू इस बात को कि उन बंज़र किनारो को तेरा इंतज़ार आज भी है।।

 

बहुत गुमां है तुझे तेरी हस्ती पर जब से इस जहां का बादशाह तू बन बैठा,

वो ख़ुदा ना भुला है तुझे पल भर को, बस तेरी एक अरदास की आस उसे आज भी है।।

 

छोड़ आया था जिस मोह्ब्बत को तू उन गलियों में सदियों पहले,

उस मासूम मोह्ब्बत को तेरी एक नज़र का इंतज़ार आज भी है।।

 

इस शाम को इंतज़ार तेरा आज भी है, उन गलियों को तुझ से प्यार आज भी है,

मानता है जिन्हें तू बेगाना उन बेगानों को तुझ से प्यार आज भी है।।

आशिक़ी

उस बेज़ुबाँ आशिक़ी का आलम क्या हम तुम्हे बताएं ऐ सनम,

वो मोहब्बत जो जवां हुई उस दरख़्त तले उस मोहब्बत का दर्द भी तुझे क्या सुनाएं ऐ सनम।।

 

वो बचपन के किस्से, वो जवानी की गलती, उन का भी क्यों हिसाब लगायें आज हम,

उन भूली सी यादों में वो नरगिस से चेहरा, उसे लगाए सीने से जीते ना जाने आज भी क्यों हम।।

 

उन बिरहा की रातों में तेरी पायल का मिलना और उस पायल की छन छन पर बूंदों का गिरना,

उन सावन की रातों में यादों का बरसाना, क्यों आज भी उन यादों से दिल लगते है हम।।

 

उस समंदर की यादों में तेरे कदमों के निशां, उन सुरमई आंखों की ख़ामोश ज़ुबाँ,

उन उलझी हुई लटों में तेरा यूँ उलझना, ना जाने उस उलझन से क्यों आज भी फस जाते है हम।।

 

उस मौसमें इश्क़ की कहानी क्या ही बयां करें हम,

परवान पर मोहब्बत यूँ थी जैसे रात के आग़ोश में चमकता चाँद रहे हरदम।।

 

बंज़र धरा पर वो बरखा का गिरना वो बूंदों की टप टप से मिट्टी का हँसना,

और उस मिट्टी की महक में तेरी महक को आज भी ना जाने क्यों खोजते हम।।

 

उस बेज़ुबाँ आशिक़ी का आलम क्या हम तुम्हे बताएं ऐ सनम,

वो मोहब्बत जो जवां हुई उस दरख़्त तले उस मोहब्बत का दर्द भी तुझे क्या सुनाएं ऐ सनम।।

ज़रूर हैं

तेरे ज़ेहन के हर सवाल का जवाब बेशक़ हो ना हो,

मग़र इस क़ायनात में तेरी एक जग़ह तो ज़रूर है।।

 

यूँ मायूस ना हो देख कर उन बिखरे ख्वाबों को तू,

ख्वाबों के बिखरने और संजोने के पीछे कोई मुनासिब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

ठोकरों से टूट कर तू खड़ित तो मानो हो गया है,

पर भूल मत उस खंडन के पीछे तेरे कर्मों का हाथ तो कहीं ज़रूर है।।

 

माना कई हाथ छुटे हैं तेरे हाथों से इस जिंदगी की ज़द्दोज़हत में,

पर तेरे इस अकेलेपन की कोई मुनासिब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

तू बेशक़ बादशाह बन बैठा इस जहां के तख्तोताज़ पर आज,

सब पा कर भी तेरे हाथ खाली होने की कोई वज़ह तो ज़रूर है।।

 

इस सूखी हवा में फैली तबस्सुम की महक है आज,

कहीं इस बंज़र ज़मी पर बरसात तो हुई ज़रूर है।।

 

इतनी फरियादों के बावज़ूद जब उस खुदा से तेरा सामना न हो पाया,

उस खुदा के पास तेरे रूबरू ना आने की कोई वाज़िब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

वो मोहब्बत इतनी ग़हरी थी मग़र अपना मुक़ाम फ़िर भी ना पा सकी,

तेरे सपने मुकमल ना हो सकने के पीछे कोई छिपी वज़ह तो ज़रूर है।।

 

तेरे ज़ेहन के हर सवाल का जवाब बेशक़ हो ना हो,

मग़र इस क़ायनात में तेरी एक जग़ह तो ज़रूर है।।