नारी

तेरे होने पर अहसास होता है जीवन का,

तू न होती तो इस धरा पर जीवन का होना ना मुमकिन होता।।

तेरी गोद मे पल कर बड़े हुए, तेरी उंगली थाम कर चलना सीखा सबने,

तू ना होती तो यूँ बेफ़िक्र जीना ना मुमकिन होता।।

इस कलाई को सजाया तूने, झूठ बोल कर ना जाने कितनी बार बचाया तूने,

तू ना होती तो यूँ खुद से लड़पाना ना मुमकिन होता।।

बचपन में साथ निभाया तूने, दोस्त बन कर खूब हंसाया तूने,

तू ना होती तो यूँ ख़ुशी से जी पाना ना मुमकिन होता।।

तू माँ है, तू ही है भगिनी, तू दोस्त है, तू ही प्रेमिका है, तू है जगत जननी और अंतकाल तू ही है विध्वंसिनी।।

तेरे होने पर ही अहसास होता है जीवन का,

तू ना होती तो इस धरा पर जीवन का होना ना मुमकिन होता।।

इंतज़ार

इस शाम को इंतज़ार तेरा आज भी है, उन गलियों को तुझ से प्यार आज भी है,

मानता है जिन्हें तू बेगाना उन बेगानों को तुझ से प्यार आज भी है।।

 

वक़्त की गुत्थियां सुलझाने में माना तू बहुत है उलझ गया,

पर उस ख़ाली घर को तेरे आने की आस आज भी है।।

 

चंद कागज़ो की दौड़ में तू भूल बैठा जिस ममता के आँचल को,

तेरी उस बूढ़ी माँ को तेरे घर आने की आस आज भी है।।

 

ना जाने किस मृगतृष्णा से तू यूँ व्यथित हो रहा,

ख़ुद को तो तूने खो दिया अब संबंधों को भी बेवज़ह खो रहा।।

 

ये चेहरे की झुर्रियाँ और वो बढ़ती उम्र आईना नहीं तेरे तज़ुर्बे का,

उन पथराई आंखों में किसी मंज़िल का इंतज़ार आज भी है।।

 

उस अनजाने जहां की तलाश में बहुत दूर ले आया है तू कश्ती अपनी,

क्यों भूल बैठा है तू इस बात को कि उन बंज़र किनारो को तेरा इंतज़ार आज भी है।।

 

बहुत गुमां है तुझे तेरी हस्ती पर जब से इस जहां का बादशाह तू बन बैठा,

वो ख़ुदा ना भुला है तुझे पल भर को, बस तेरी एक अरदास की आस उसे आज भी है।।

 

छोड़ आया था जिस मोह्ब्बत को तू उन गलियों में सदियों पहले,

उस मासूम मोह्ब्बत को तेरी एक नज़र का इंतज़ार आज भी है।।

 

इस शाम को इंतज़ार तेरा आज भी है, उन गलियों को तुझ से प्यार आज भी है,

मानता है जिन्हें तू बेगाना उन बेगानों को तुझ से प्यार आज भी है।।

आशिक़ी

उस बेज़ुबाँ आशिक़ी का आलम क्या हम तुम्हे बताएं ऐ सनम,

वो मोहब्बत जो जवां हुई उस दरख़्त तले उस मोहब्बत का दर्द भी तुझे क्या सुनाएं ऐ सनम।।

 

वो बचपन के किस्से, वो जवानी की गलती, उन का भी क्यों हिसाब लगायें आज हम,

उन भूली सी यादों में वो नरगिस से चेहरा, उसे लगाए सीने से जीते ना जाने आज भी क्यों हम।।

 

उन बिरहा की रातों में तेरी पायल का मिलना और उस पायल की छन छन पर बूंदों का गिरना,

उन सावन की रातों में यादों का बरसाना, क्यों आज भी उन यादों से दिल लगते है हम।।

 

उस समंदर की यादों में तेरे कदमों के निशां, उन सुरमई आंखों की ख़ामोश ज़ुबाँ,

उन उलझी हुई लटों में तेरा यूँ उलझना, ना जाने उस उलझन से क्यों आज भी फस जाते है हम।।

 

उस मौसमें इश्क़ की कहानी क्या ही बयां करें हम,

परवान पर मोहब्बत यूँ थी जैसे रात के आग़ोश में चमकता चाँद रहे हरदम।।

 

बंज़र धरा पर वो बरखा का गिरना वो बूंदों की टप टप से मिट्टी का हँसना,

और उस मिट्टी की महक में तेरी महक को आज भी ना जाने क्यों खोजते हम।।

 

उस बेज़ुबाँ आशिक़ी का आलम क्या हम तुम्हे बताएं ऐ सनम,

वो मोहब्बत जो जवां हुई उस दरख़्त तले उस मोहब्बत का दर्द भी तुझे क्या सुनाएं ऐ सनम।।

ज़रूर हैं

तेरे ज़ेहन के हर सवाल का जवाब बेशक़ हो ना हो,

मग़र इस क़ायनात में तेरी एक जग़ह तो ज़रूर है।।

 

यूँ मायूस ना हो देख कर उन बिखरे ख्वाबों को तू,

ख्वाबों के बिखरने और संजोने के पीछे कोई मुनासिब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

ठोकरों से टूट कर तू खड़ित तो मानो हो गया है,

पर भूल मत उस खंडन के पीछे तेरे कर्मों का हाथ तो कहीं ज़रूर है।।

 

माना कई हाथ छुटे हैं तेरे हाथों से इस जिंदगी की ज़द्दोज़हत में,

पर तेरे इस अकेलेपन की कोई मुनासिब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

तू बेशक़ बादशाह बन बैठा इस जहां के तख्तोताज़ पर आज,

सब पा कर भी तेरे हाथ खाली होने की कोई वज़ह तो ज़रूर है।।

 

इस सूखी हवा में फैली तबस्सुम की महक है आज,

कहीं इस बंज़र ज़मी पर बरसात तो हुई ज़रूर है।।

 

इतनी फरियादों के बावज़ूद जब उस खुदा से तेरा सामना न हो पाया,

उस खुदा के पास तेरे रूबरू ना आने की कोई वाज़िब वज़ह तो ज़रूर है।।

 

वो मोहब्बत इतनी ग़हरी थी मग़र अपना मुक़ाम फ़िर भी ना पा सकी,

तेरे सपने मुकमल ना हो सकने के पीछे कोई छिपी वज़ह तो ज़रूर है।।

 

तेरे ज़ेहन के हर सवाल का जवाब बेशक़ हो ना हो,

मग़र इस क़ायनात में तेरी एक जग़ह तो ज़रूर है।।

अक़्सर

मैं अक़्सर तेरी परछाईं को खोजा करता हूँ धूप भरी राहों में,

मैं खोजा करता हूँ अक़्सर उन लम्हों को जो बिताएं थे हमने साथ में।।

 

फ़लसफ़ा उन भीगीं रातों का यूँ स्याह होगा हमें अंदाज़ ना था,

मैं अक़्सर खोजा करता हूँ उन गुज़री हुईं यादों में उन भूले हुए संवादों को।।

 

दिन बीते साल बीते और सदियाँ यूँही गुज़र गई मानो उन छोटी छोटी मुलाक़ातों में,

मैं अक़्सर ढूंढा करता हूँ बहाने तुझे पाने के उन बासी पुरानी यादों में।।

 

इन सावन की रातों में जब काले बादल घिरते हैं जब हल्की हल्की बूंदे वो दिल पर दस्तकें देती हैं,

मैं अक़्सर सोचा करता हूँ वो वज़ह की आज भी है तू कहीं क्यों इस सीने में।।

 

खेल खेल में मोह्ब्बत हुई और खेल खेल में वादें कई,

मैं अक्सर ढूंढा करता हूँ उन अधूरे सपनो को उन टूटे वादों के ढेरों में कहीं।।

 

अब तो नामुम्किन सा ही लगता हैं कि होगी इन राहों में अपनी मुलाक़ात कभी,

मैं अक़्सर सोचा करता हूँ कि वक़्त आया है करने का हिसाब मेरे गुनाहों का अभी।।

 

वो खिलखिलाहट सी तेरी आज भी इस ज़ेहन में कहीं बाकी हैं,

मैं आज भी खोजा करता हूँ इस भीड़ में ग़ुम हुऐ तेरे उस चेहरे को कभी कभी।।

 

मैं अक्सर खोजा करता हूँ आज भी उन गुज़रे हुए लम्हों को,

उन गुज़री हुई रातो को, वो तेरी आँखों में बसी उन अनकहीं बातों को।।

 

मैं अक्सर खोजा करता हूँ, मैं अक्सर खोजा करता हूँ।।

 

सफ़र

सफ़र में बसर हो रही है जिंदगी, कहाँ वक़्त है कि दो पल चैन से कोई सांस भी ले सके।।
काश न गया होता वो बचपन हमारा, इस नरम कुर्सी से तो वो धूप ही अच्छी थी।।

 
ख्यालों के इस जहां में बिखरे है अरमान कई, कहाँ वक़्त है कि उन को उठा कर सीने में भी भर ले।।
काश वो वक़्त न गुज़रा होता, इस दुनिया की भीड़ से तो तेरी आँखों की गहराई ही अच्छी थी।।

 
इस जीवन की आपाधापी ने यूँ निगल लिया अरमानो को, बेतुकी इस दौड़ से हट कर कोई आराम करे तो बईमानी हैं।।
इन नोटों से भरे मोटे पेटों से तो वो दो रोटी की भूख कही अच्छी थी।।

 
सावन की काली रातें जो सुनातीं थी झिंगुर की तान कई, इन शहरों की चकाचोंध में ग़ुम आज तो इस ज़ेहन की आवाज़ हुई।।

बंद महलों में गुज़रती इन बिरह की रातों से तो उस बूढ़े दरख्त के तले हुई चंद लम्हों की गुफ़्तगू अच्छी थी।।

 
गुज़रती उम्र के साथ तज़ुर्बा तो बढ़ता गया पर कहीं छोड़ दिया अहसासों को उस बीते बचपन की गलियों में।।
इस मशगूल ज़िंदगानी से तो वो फ़ुरसत भरी जवानी अच्छी थी।।

 
सफ़र में बसर हो रही है जिंदगी, कहाँ वक़्त है कि दो पल चैन से कोई सांस भी ले सके।।
काश न गया होता वो बचपन हमारा, इस नरम कुर्सी से तो वो धूप ही अच्छी थी।।

ख्वाहिशें

मैं ख्वाहिशों का अम्बार लगता गया तू रेत सी हथेली से फिसलती गई, मैं वक़्त यूँही गवाता गया तू पानी सी बहती रही।।

ऐ मेरे मुसाफ़िर तू मिला मुझे बड़ी देर से, मैं सदियों इंतज़ार करता रहा, तू भी यहां वहां यूँही भटकता रहा।।

एक मुक़ाम की तलाश में सफर यूँ करता गया,मंज़िलों की तलाश में ज़िन्दगी से दूर होता गया।।

मुर्दो की इस बस्ती में मोहब्बत खोजता रहा, मिला तो कुछ भी नहीं बस अपना वज़ूद खोता गया।।

यूँ तो भूख मेरी बहुत है, आंखों में नींद भी कम नही, ढूंढता मैं रहा चैन को इस जहां में, पाया तो कुछ भी नही मैंने यहाँ, जो था हाथ मे उसे भी गवा मैंने यूँही दिया।।

भुला कर ज़रूरतों को अपनी मैं लग गया ना जाने किस खेल में, जंग तो बस दो रोटियों की थी ना जाने क्यों जग जीतने की ख्वाहिश मैं करने लगा।।

उन मासूम निगाहों में सपने तो बस माटी के घरोंदों के थे, क्यों महलों की ख्वाहिश कर के उन सपनों को हाथ से गवाया मैंने।।

खेल बचपन के बड़े ही अनोखे थे, कही वो कागज की कश्ती थी तो कही वो मिट्टी के खिलौने थे, जवानी की ख्वाहिश में उस बचपन को बेकार ही गवाया हमने।।

मैं ख्वाहिशों का अम्बार लगता गया तू रेत सी हथेली से फिसलती गई, मैं वक़्त यूँही गवाता गया तू पानी सी बहती रही।।