औकात

​एक पैर को जंजीर से बांधे में रखता हूं, ज्यादा उड़ न सकूँ तभी खुद को इस ज़मीन से बांधे रखता हूँ।।


तोड़ी मिट्टी ज़ेब में साथ रखता हूं, सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।


तेरा मेरा सामना अब तो कम ही होता है, पर शाम और सहर में मैं तेरा नाम याद रखता हूं।


आज बेशक़ बादशाह बन कर बैठें हैं इस तख्तोताज पर हम, लेकिन आज भी उस गुज़रे वक़्त को याद रखता हूँ।।


छोड़ कर उस मोहब्बत को हम आगे ज़रूर बढ़ गए, पर आज भी उस प्यार को इस ज़ेहन में याद रखता हूँ।।


पेट भरा है ज़रूर आज मेरा, लेकिन उस भूख को मैं आज भी साथ रखता हूँ। सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।


महफ़िलो की कमी नही आज इस जहां में, पर उन तन्हाईओं के समंदर को ज़ेहन में अब भी दबा कर रखता हूँ।।


बन्दे तेरा वज़ूद ही क्या है उस तक़दीर के आगे, माटी का मैं पुतला हूँ ये ख्वाबो में भी याद रखता हूँ।।


ख्वाहिश ज़रूर रखता हूँ मै तारों को छूने की, मगर घर है ज़मीन मेरा ये भूलने की ख़ता ना करता हूँ।।


एक पैर को जंजीर से बांधे में रखता हूं, ज्यादा उड़ न सकूँ तभी खुद को इस ज़मीन से बांधे रखता हूँ।।


सब भूल भी जाऊं तब भी अपनी औकात याद रखता हूँ।।

फ़ौजी भाई

मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।


तुझ पर चली हर गोली और फैंके हुए पत्थर का जवाब दूँगा मै, कोई तेरा साथ दे ना दे पर साथ तेरे चलूँगा मैं।।


सही गलत का हिसाब करते होंगे ये आधुनिक साहित्यकार, मेरे लिए तो यही बहुत है कि तू लड़ता है जग से हमारे लिए बिना माने हुए कभी हार।।


भूल कर तेरी क़ुर्बानी ये दुनिया ना जाने किस ओर चली, भूल चले ये मदहोश सभी कि ये ख़ैरात की आज़ादी है कितनी लाशो के ढेरों से है हमे मिली।।



बंद कमरों में बैठ कर यूँ बाते करना तो बहुत आसान है, धूप, बारिश, सर्दी, अंधड़ इन सब से लड़ कर भी खड़े रह कर बताएं तब मैं मानु कि इन कलम के क्रांतिकारियों में भी कुछ जान है।।


मैं क्या ही दे पाउगा तुझे ऐ मेरे भाई, एक अनजान के लिए तूने है अपनी जान की बाज़ी जो लगाई।।


ना भूल तू ये कभी करना सोचने की के यहां सब तुझ से नफरत करते है, इस देश मे आज भी वो लोग ज़िंदा है जो खुद से ज्यादा इस देश से मोहब्बत करते है।।


मातृभूमि का ऋण आज मुझे भी चुकाना हैं, ऐ मेरे फौजी भाई तुझे आज गले से लगाना है।।

फ़ुरसत

ढूँढा करता हु वो फ़ुरसत के पल जो बीता करते थे यारो के संग, आज कल तो जिंदगी मानो पैसे की मोहताज़ हो गई है।। बिना फ़ुरसत के तो ये दिन भी अब कोहसार सा लगता है, ना चढ़ना ही मुमकिन होता है ना कूद ही पाते है।।


हर गुज़रते लम्हे से सवाल यही पूछा करता हूँ कि तुझ से बेहतर लम्हा भी क्या कभी मैं जी भी पाऊँगा।। वो पल फ़ुरसत के जो अब भी ज़ेहन में हरे है, क्या कभी उन पलों को वापस कभी ला पाउगा।।


द्वंद छिड़ा है अंतर्मन में, विध्वंसक जिस की प्रकृति है, क्या कभी उस निर्मम क्षन को मैं भुला भी पाउगा।। क्या कभी इस जंग से निकल कर उन लम्हो को फिर जी भी पाउगा।।


जाने किस की तलाश में गुम हुँ मैं सदियों से, ना तलाश ही खत्म होती है और वक़्त भी गुज़रता जाता है।। हर उस गुज़रते पल में एक फ़ुरसत का लम्हा दम तोड़ जाता है।।

तेरा मिलना

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।

बेवज़ह ही दौड़ता रहा यहां वहां मैं यूँही निकाल दी सदियाँ बस तेरे ही इंतज़ार में।।

कागजों पर खींच लकीरें तस्वीर तेरी बनानी चाही पर क्या पता था मुझे भी की तू तो बस है मेरी ही परछाई।।

आंखों में तेरी हैं समंदर सी गहराई ना जाने हमे क्यों एक दम से दी उन में अपनी दुनिया दिखाई।।

यूँ तो पत्थर को भगवान बना कर लोग पूजते तो हैं पर तुझ में ही हमे दी इश्क़ की देवी दिखाई।।

मेरा भी वज़ूद क्या है इस विशाल जहां में, आसमां में लाखों तारे पर में कही दूर चमकता दूँगा तुझे दिखाई।।

तेरा मिलना इस अनजाने जहां में मानो मिल गई हो सूरज की एक किरण उस फैले अंधकार में।।

खत

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।



कई ज़िन्दगानियां दफ़न है उन अल्फाज़ो के दरमियां जिन्हें हिस्सा अतीत का हुए भी बरसो बीत गए, वो कहानियां आज भी मौज़ूद है कही उन टुकड़ो में अभी।।



उस मोहब्बत की कैद से आज़ाद हुए भी सदियां गुज़र चुकी, पर निशां बाकी है कहीं उन लकीरों में अभी।।



वो गल चुके, पीले से कागज़ के टुकड़ो को बटोरता हूँ उन दबी पुरानी किताबो में से कभी, तो सोचता हूँ कि क्या क़सूर था इन अल्फाज़ो का जो रह गए अनकहे? घोंट दिया गला जिन का इस हरज़ाई ज़माने के लिए।।

तेरे आंसूओं के निशां आज भी दिखते है उस फैली हुई स्याही पर, उन मुरझाए हुए हिस्सों में ना जाने कितनी मुस्कराहटें बंद हैं।।



दबे पांव चली आती है एक सवाल लिए वो सिरहन कभी कभी इस ज़ेहन में, कि क्यों दफना दिया तुमने मुझे उन अँधेरे कोनो में यूँही।।

वो फटे पुराने कागज़ के टुकड़े जो उन बासी लिफाफों में से झांकते है, एक ज़माने को कैद किये हुए है वो आज भी अपने ज़ेहन में।।

अतीत

मेरे वज़ूद की तलाश में यूँही अतीत की परतें हटाता चला गया, मिला तो कुछ भी नहीं बस यूँही खुद को गवाता चला गया।।


महफ़िलो में रंग भरते भरते मैं अपने रंग यूँही उडाता चला गया, चाहते अपनी जला कर ख्वाब दुसरो के सजाता चला गया।।


उन धुल भरी किताबो में कई चेहरे मिले जाने पहचाने से, उन भूली बिसरी यादों को मैं सीने से लगता चला गया।।


पंछी जो छोड़ गए थे आशियाने को उनकी तलाश में वक़्त यूँही गवाता चला गया, वो बंज़र ज़मीन पर एक बूँद की आस में अपनी प्यास बेमतलब ही बढ़ाता चला गया।।


खुली आँखों से देखे थे जो सपने हमने कभी, उन की ख़ाक को मुट्टी में भरता चला गया, उस भूली मोह्ब्बत की याद में दिन को रात और रात को दिन करता चला गया।।



ना जाने किस परछाई का पीछा करते करते उस मंज़िल से दूर मैं होता चला गया, जो राहे मुडती थी मेरे घर की ओर उन्हें छोड़ बेवज़ह ही दुनिया में भटकता मैं चला गया।।


सन्नाटे की खोज में उस चकाचोंध से दूर होता चला गया, आज को भूल कर फिर उस अतीत में खोता चला गया।।


मेरे वज़ूद की तलाश में यूँही अतीत की परतें हटाता चला गया, मिला तो कुछ भी नहीं बस यूँही खुद को गवाता चला गया।।

बात

आज चलो कुछ बात करते हैं, उस बीते वक़्त को थोड़ा याद करते है।

उस पुरानी मोहब्बत के साथ चलते है, कुछ मेरे गुनाहों का हिसाब करते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।


ज़िन्दगी की राहों पर कुछ दूर चलते हैं, हाथ थाम कर एक दूजे की आँखों में खो जाते है।

आज हर शिकायत भुला देते है, कोई नई एक शरुआत करते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।


उस बूढ़े दरख्त के पास चलते है, छाव में उस की आज फिर थोड़ा आराम करते है।

भुला कर बैर सारा, उस खुदा से आज फिर कोई अलग फ़रियाद करते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।



सावन की काली रातो में थोड़ा चांदनी को याद करते है, उस रूठे यार को आज मनाने की बात करते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।


बैरकाशी भुला कर थोड़ा प्यार करते है, बिखरे ख्वाब संजो कर आज फिर एक दुनिया तैयार करते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।


ज़िन्दगी से छुट्टी ले कर एक माटी का घरोंदा तैयार करते है, जो उड़ गए परिंदे शाख से फिर उन को आवाज देते है।

चलो आज कुछ बात करते है।।


उन अनजानी राहो पर आज थोड़ा फिर साथ चलते है,

हाथ थाम एक दूजे का फिर गुज़री मोहब्बत को याद करते है।

चलो आज फिर कुछ बात करते है।।


दौड़ते दौड़ते थक गया हूं चलो अब तोडा आराम करते है,

जीवन की आपा धापी से कही दूर ज़िन्दगी तमाम करते है।

चलो आज कुछ बात करते है, एक नई शुरुआत करते है।।